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प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को अपने परमाणु अप्रसार रिकार्ड पर गर्व है और यह व्यापक जनसंहार के हथियारों के प्रसार को रोकने के लिये प्रतिबद्ध है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु आतंकवाद को विश्व के लिए एक बड़ी चुनौती बताते हुए मंगलवार को कहा कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु अप्रसार व्यवस्था का अपने उद्देश्य में सफल नहीं होना अत्यंत खेदजनक है और इसका हमारी सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
डॉ. सिंह ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए भारत के इस दृष्टिकोण को दोहराया कि परमाणु अप्रसार के प्रयासों की सफलता के लिए जरूरी है कि यह सार्वभौमिक, गैर भेदभावपूर्ण, व्यापक और पूर्ण विश्व निशस्त्रीकरण के उद्देश्य से जुडे़ होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि विश्व में इस दृष्टिकोण का समर्थन बढ़ रहा है। तीन दिन की इस संगोष्ठी का आयोजन देश के परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा के शताब्दी वर्ष के सिलसिले में किया गया है। उन्होंने अप्रसार संधि (एनपीटी0 का नाम लिए बिना कहा कि यह अत्यंत खेदजनक है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार व्यवस्था परमाणु प्रसार को रोकने में सफल नहीं हुई है तथा इस व्यवस्था की खामियों का असर हमारी सुरक्षा पर पड रहा है।
उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गत सप्ताह एक प्रस्ताव पारित कर सभी देशों से एनपीटी पर हस्ताक्षर करने को कहा है। भारत ने ऐसा करने से इंकार किया है क्योंकि वह इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि परमाणु अप्रसार के मामले पर हमें अपने रिकार्ड पर गर्व है और हम जनसंहार के हथियारों के प्रसार पर रोक लगाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के प्रति कटिबद्ध हैं। हम परमाणु परीक्षण नहीं करने की स्वैच्छिक और एकतरफा रोक के प्रति वचनबद्ध हैं। डॉ. सिंह ने परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि हमने प्रभावी, व्यापक और अद्यतन निर्यात नियंत्रण व्यवस्था लागू की हुई है तथा हम गैर परमाणु देशों को संवेदनशील प्रौद्योगिकी और उपकरण हस्तांतरित नहीं करने के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
उन्होंने परमाणु आतंकवाद के खतरे को पूरे विश्व के लिए एक बड़ी चुनौती बताते हुए कहा कि भारत ने इस खतरे से निपटने के उपायों के संबंध में संयुक्त राष्ट्र आमसभा में एक प्रस्ताव भी पेश किया है। उन्होंने कहा कि परमाणु सुरक्षा को बेहतर बनाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को सुदृढ करने के हम पक्षधर हैं और 2010 में परमाणु सुरक्षा पर शिखर सम्मेलन आयोजित करने की अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल का स्वागत करते हैं।
उन्होंने कहा कि जहां हम परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल को बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं वहीं हमारा दायित्व है कि पूरी मानवता की भलाई के लिए इसके विध्वंसकारी इस्तेमाल पर रोक लगाएं। उन्होंने कहा कि भारत शुरू से जनसंहार के सभी हथियारों को समाप्त करने की वकालत करता आ रहा है तथा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1988 में इसके लिए व्यापक कार्ययोजना भी पेश की थी।
प्रधानमंत्री ने कहा कि परमाणु शक्ति का यदि हम विश्व की भलाई के लिए बुद्धिमतापूर्ण ढंग से इस्तेमाल करते हैं तो इसकी संभावनाएं असीम हैं, लेकिन यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो इसके परिणाम शांति और प्रगति के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल को बढावा देने तथा परमाणु प्रसार के खतरे को कम करने में अहम भूमिका निभानी होगी। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक मोहम्मद अलबरदेई इस अवसर पर मौजूद थे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु मुख्यधारा में भारत की वापसी न केवल हमारे लिए बल्कि विश्व ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि असैन्य परमाणु पहल के तहत कई देशों के साथ हुए समझौतों से भारत और विश्व समुदाय के बीच असैन्य परमाणु सहयोग शुरु होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले महीनों में इन समझौतों का पूरी तरह और प्रभावी क्रियान्वन होगा। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस अवसर पर 100 रुपये और दस रुपये मूल्य के भाभा शताब्दी स्मारक सिक्के जारी किए।

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