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गोधरा कांड में हाईकोर्ट की मोदी को फटकार
अहमदाबाद, एजेंसी
First Published:08-02-12 01:32 PM
Last Updated:08-02-12 02:30 PM
गुजरात उच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों के दौरान कार्रवाई नहीं करने और लापरवाही बरतने के मामले में बुधवार को राज्य की नरेंद्र मोदी सरकार को फटकार लगाई। दंगों के दौरान बड़े स्तर पर धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचा था।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश भास्कर भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की खंडपीठ ने प्रदेश में 500 से अधिक धार्मिक स्थलों के लिए मुआवजा देने का भी आदेश दिया। अदालत ने इस्लामिक रिलीफ कमेटी ऑफ गुजरात (आईआरसीजी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि दंगों को रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से कमी, कार्रवाई नहीं होने और लापरवाही के नतीजतन प्रदेश में व्यापक स्तर पर धार्मिक स्थानों को नुकसान पहुंचा।
अदालत ने कहा कि इन स्थानों में मरम्मत और मुआवजे की जिम्मेदारी सरकार की है। अदालत ने कहा कि जब सरकार ने मकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को हुए नुकसान के लिए मुआवजा अदा किया तो उसे धार्मिक स्थलों को भी क्षतिपूर्ति देनी चाहिए।
अदालत ने यह आदेश भी दिया कि प्रदेश के 26 जिलों के मुख्य न्यायाधीश अपने संबंधित जिलों में धार्मिक स्थानों के लिए मुआवजे के आवेदनों को प्राप्त कर उन पर फैसला करेंगे। उन्हें छह महीने के भीतर अपने फैसले उच्च न्यायालय को बताने को कहा गया है।
वर्ष 2003 में आईआरसीजी की याचिका में मांग की गयी थी कि दंगों के दौरान धार्मिक स्थलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार को मुआवजा अदा करने का निर्देश इस आधार पर दिया जाए कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इसकी सिफारिश की थी और राज्य सरकार ने सैद्धांतिक तौर पर सुझाव को स्वीकार किया था।
राज्य सरकार ने आईआरसीजी की याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि यह संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन है। सरकार ने कहा कि दंगों के दौरान टूटे या क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों की मरम्मत के लिए मुआवजे के संबंध में कोई नीति नहीं है।
आईआरसीजी के वकील एमटीएम हाकिम ने अदालत के फैसले को ऐतिहासिक निर्णय की संज्ञा दी। हाकिम ने कहा कि संभवत: ऐसा भी पहली बार हुआ है कि 2002 के दंगों के दौरान कार्रवाई नहीं करने और लापरवाही के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश भास्कर भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की खंडपीठ ने प्रदेश में 500 से अधिक धार्मिक स्थलों के लिए मुआवजा देने का भी आदेश दिया। अदालत ने इस्लामिक रिलीफ कमेटी ऑफ गुजरात (आईआरसीजी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि दंगों को रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से कमी, कार्रवाई नहीं होने और लापरवाही के नतीजतन प्रदेश में व्यापक स्तर पर धार्मिक स्थानों को नुकसान पहुंचा।
अदालत ने कहा कि इन स्थानों में मरम्मत और मुआवजे की जिम्मेदारी सरकार की है। अदालत ने कहा कि जब सरकार ने मकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को हुए नुकसान के लिए मुआवजा अदा किया तो उसे धार्मिक स्थलों को भी क्षतिपूर्ति देनी चाहिए।
अदालत ने यह आदेश भी दिया कि प्रदेश के 26 जिलों के मुख्य न्यायाधीश अपने संबंधित जिलों में धार्मिक स्थानों के लिए मुआवजे के आवेदनों को प्राप्त कर उन पर फैसला करेंगे। उन्हें छह महीने के भीतर अपने फैसले उच्च न्यायालय को बताने को कहा गया है।
वर्ष 2003 में आईआरसीजी की याचिका में मांग की गयी थी कि दंगों के दौरान धार्मिक स्थलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार को मुआवजा अदा करने का निर्देश इस आधार पर दिया जाए कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इसकी सिफारिश की थी और राज्य सरकार ने सैद्धांतिक तौर पर सुझाव को स्वीकार किया था।
राज्य सरकार ने आईआरसीजी की याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि यह संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन है। सरकार ने कहा कि दंगों के दौरान टूटे या क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों की मरम्मत के लिए मुआवजे के संबंध में कोई नीति नहीं है।
आईआरसीजी के वकील एमटीएम हाकिम ने अदालत के फैसले को ऐतिहासिक निर्णय की संज्ञा दी। हाकिम ने कहा कि संभवत: ऐसा भी पहली बार हुआ है कि 2002 के दंगों के दौरान कार्रवाई नहीं करने और लापरवाही के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है।
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